Showing posts with label कविता. Show all posts
Showing posts with label कविता. Show all posts

Thursday, 11 September 2014

कुछ याद नहीं
चारों ओर है घिरा अँधेरा
जाने कब था हुआ सवेरा
कब छुआ था सूरज की किरणों ने
कब अधरों पर फूल खिला था
कुछ याद नहीं
चिड़ियां चहचहाईं थीं कब खिड़कियौं में 
कब तारों का जाल बिछा था अंबर में
बच्चे झगड़े चिल्लाए थे कब आँगन में
कब देखे थे सपने सुनहरे दिन में
कुछ याद नहीं
कब दिल धड़का था सीने में
निगल गया है सब कुछ
जैसे यह अंधियारा
डूब गया हो किसी गुफ़ा में
जैसे जग सारा
एक किरन भर भी आशा
कहीं उपलब्ध नहीं
इस तम का क्या कहीं
कोई अंत नहीं
क्या कोई नहीं जो
ज्योति एक जला दे
इस बुझते हृदय में
एक पुष्प खिला दे
© आई बी अरोड़ा 

Monday, 8 September 2014

कभी सोचा था
कभी सोचा था कि
एक देवदार-सा धरती से उठ
आकाश की और चल दूंगा
हिम पर्वत पर बिखरी किरणों को
मुठ्ठियों में बंद कर लूंगा
तारों को छूं लूंगा
लेकिन
सारा सोचा समझा जीवन का गणित
कहीं बीच में ही खड़बड़ा गया
जब भी जितना भी
ऊपर उठा
उतने ही नीचे धँसता गया
नीचे
एक गहरे लिजलिजे अंधकार में
हर बार का ऊपर उठना
अपने को
नीचे धकेल कर ही हो पाया
तारों को छूने से पहले
रसातल छू लिया
परन्तु
इतना सम्मोहित कर रखा था
ऊँचाइयों  ने
कि पतन का अहसास ही न हुआ
कभी सोचा ही नहीं
कि जितना जाऊंगा नीचे
उतना ही दूर होते जायेंगे
हिम पर्वत/आकाश/तारे
आज पड़ा हूँ
एक गहरे अंधकार में
ढूंढता उस देवदार को
जो धरती से उठ
सीधा चल देता है
आकाश की ओर

© आई बी अरोड़ा 

Thursday, 4 September 2014

रंग ले आये
सुनो,
रुको/सुनो,
सड़क पर, गली में, नाली के अंदर
बहता यह लहू
अगर तुमको दिखाई नहीं देता
तो इस लहू का ही दोष होगा,
शायद यह लहू रंगहीन होगा.
पर देख सकते हो तो देख लो
यह छलनी सीना
यह कुचली देह
यह फूटा सिर.
रुको और देख लो,
यह सब अभी इसी पल,
कौन जाने कब किस पल
ऐसा ही कुछ
तुम्हारे साथ भी घट जाये.
तुम्हें बहता लहू दिखाई नहीं देता
लहू से सने हाथ दिखाई नहीं देते
अँधेरे को चीरती चीखें सुनाई नहीं देतीं
तो यह तुम्हारा भ्रम ही है
क्योंकि यह सब यहीं हैं
जैसे मृत्यु यहीं है
यह सब तुम्हारी ओर बढ़ रही हैं
जैसे मृत्यु तुम्हारी ओर बढ़ रही है,
हर पल, हर क्षण.
सुनो,
कोई चिल्लाया
शायद किसी कंस ने
किसी बालकृष्ण को मार गिराया.
सहमो मत
सहमा हुआ व्यक्ति
बहुत धीरे मरता है
और एक दुखदायी मौत ही मरता है.
रुको और लौट आओ,  
लौट आओ
और भिगो लो अपने हाथ
इस बहते लहू में
अभी इसी क्षण.
फिर शायद
तुम भयभीत न रहो
फिर शायद
तुम्हें दिख जाये
बहता लहू
लहू से सने हाथ
हाथ में खंजर .
फिर शायद
तुम्हारे हाथों में
जुम्बिश आ जाये
और तुम्हारा लहू
सड़क पर, गली में, नाली के अंदर
बहते इस बैरंग लहू में
रंग ले आये.   
(कई वर्ष पुरानी घटना है. एक पत्रकार और उसकी पत्नी को किसी राजनेता के गुंडों ने पीछा कर मारा और अंततः उनकी हत्या कर दी. लोग बस चुपचाप देखते रहे. कोई उनकी सहायता के लिए आगे न आया. उस घटना के वर्णन ने मुझे बहुत प्रभावित किया था और मैंने यह कविता लिखने का प्रयास किया था. ऐसी घटनायें लगातार घट रही हैं कल भी कहीं कुछ ऐसा ही हुआ है पर हम कुछ सुन देख नहीं पा रहे)
© आई बी अरोड़ा

Friday, 29 August 2014

बिखरती ज़िन्दगी
ज़िन्दगी मेरी
मेरे आसपास बिखरती जा रही है
ज़र्रा ज़र्रा
मेरे हाथ से निकलती जा रही है
मैं हूँ कि उलछा हूँ
अपने ही में
जैसे घिरा हो कोई
अर्थहीन अनबुछे प्रश्नों की झड़ी में
बिखरती  है ज़िन्दगी बाहर
बिखरता जा रहा है कुछ भीतर भी
पकडूं तो क्या
पकड़ पाऊंगा क्या
हूँ क्या
है क्या
बस इसी तरह उलछा हूँ
ज़िन्दगी में
बिखरता ज़र्रा ज़र्रा .

©आई बी अरोड़ा 

Thursday, 28 August 2014

होता है आश्चर्य
जब,
पीछे मुड़ कर देखता हूँ
तो होता है आश्चर्य,
अरे, मुझे तो हमेशा
मेरे अपनों ने ही ठगा
मुझे तो हमेशा
मेरे सपनों ने ही ठगा.
जब,
पीछे मुड़ कर देखता हूँ
तो होता है आश्चर्य,  
कोई भी तो न हुए अपने
न ही मेरे अपने
न ही मेरे सपने.
मुझे तो था विश्वास
अपनों पर भी,
सपनों पर भी.
परन्तु
न अपनों ने दिया साथ
न सपनों ने दिया साथ.
मन है कि उलझा है लेकिन
अनचाहे प्रश्नों की झड़ी में-
क्यों
मैंने अपनों के लिये
सपनों को छोड़ा ?
क्यों
मैंने सपनों के लिए
अपनों को छोड़ा ?
अब,
पीछे मुड़ कर देखता हूँ
तो होता है आश्चर्य
सिर्फ प्रश्न ही प्रश्न हैं,
वो कल भी थे साथ
वो आज भी हैं साथ.

©आई बी अरोड़ा 
आज फिर
आज फिर
मन को छू गई
तुम्हारी याद
आंसू बन आँख से बह गई
तुम्हारी कही कोई बात
आज फिर
भूले बिसरे चित्रों ने मुझ को घेर लिया
संग बिताई घड़ियों ने
दर्द भरा कोई गीत छेड़ दिया
पर
डर लगता है मुझको
समय की इस निष्ठुर चाल से
वो धीरे धीरे निगलता जा रही  है
तुम्हारी हर इक याद
तुम्हारी कही हर इक बात
दोस्त
अचानक जैसे छोड़ गये थे तुम
बीच डगर में  
डर लगता है
अब छोड़ न जाए वैसे ही
याद  तुम्हारी भी
बीच डगर में.

©आई बी अरोड़ा 

Monday, 25 August 2014

एक मित्र के नाम
बाग़  में  जब आती थी चिनार  के सूखे पत्तों की बाड़
चुपचाप हम देखते रहते थे पर्वतों की चोटियां
वो ले लेतीं गुम्मकड़ बादलों की आड़
डल  झील के किनारे मीलों चलते रहते थे चुपचाप
सुनते दूर जाती नाव के चपुओं की धीमी धीमी थाप
यूहीं खड़े हम  देखते रहते थे पानी पर बहती लहरें
अचानक तब छू जाती थीं किसी की मासूमियत की  फुहारें
बंद रोशनी में सुनना वो पुराने गीत
ख़ामोशी को बना लेना अपने मन का मीत
सब याद है कुछ भी भुला नहीं आज तक
इतनी दूर आने के बाद भी
जैसे रुका हुआ हूँ वहीं पर अबतक
जिन पेचदार रास्तों में सदा के लिये खो गये थे तुम
उन रास्तों की यादें पर अब धीरे धीरे हो रही हैं घुम
कितना खोया कितना पाया
कितना सोचा कितना जी पाया 
सब जैसे बेमानी है
मन तो जैसे अब भी अटका है
चिनार के सूखे पत्तों में
झील की निर्मल लहरों में
बंद रोशनी और पुराने गीतों में.

©आई बी अरोड़ा